समाज-परिवर्तन से पहले सोच का बदलना अत्यंत-आवश्यक है ।

समाज-परिवर्तन से पहले सोच का बदलना अत्यंत-आवश्यक है ।

लेख :- समाज-परिवर्तन एक कुम्हार हाथों में मिट्टी लेकर काफी देर से सोच-विचार में डूबा हुआ था । वह चिलम बनाने की कोशिश मे जुटा था । जैसे ही चिलम बनकर तैयार हो गई,उसने अचानक ही उसको तोड़ दिया और उसी मिट्टी से,दोबारा से सुराही बनाने में लग गया,तब उस मिट्टी ने कुम्हार से कहा तुम चिलम बनाते समय किसी गहरी-सोच में डूबे हुए लग रहे थे । लेकिन चिलम के आकार को तोड़ने पर मैं तेरा धन्यवाद करती हूं, क्योंकि यदि मैं चिलम रहती,तो खुद भी सारा दिन जलती रहती और कई लोगों को जलाती रहती । लेकिन अब तुमने मेरी आकृति में परिवर्तन करके मेरे आकार को सुराही में बदलते ही मुझे शांति-प्रदान की है,अब मैं खुद सारा दिन शीतल रहते हुए औरों को भी शीतल करती रहूंगी । इसलिए मेरे आकार मे परिवर्तन होते ही मेरा विकार खुद-बखुद ही बदल गया । मेरे आकार की प्रवति को बदलने के पीछे तुम्हारी बदली हुई सोच है । इसी तरह यदि हम समाज को अच्छा आकार देने की कोशिश करेंगे, तो उसके विकार में परिवर्तन होना लाजमी है । इस तरह नई-सोच नए-विचार सार्थकता की निशानी है । इसलिए समाज को बदलने से पहले सोच का बदलना अत्यंत-आवश्यक है ।
अनीता गुलेरिया

administrator, bbp_keymaster

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