भारत पाकिस्तान 1965 के युद्ध मे शहीद प्रहलाद सिंह।

भारत पाकिस्तान 1965 के युद्ध मे शहीद प्रहलाद सिंह।

नई दिल्ली- राकेश कुमार
समाधानवाणी
भारत पाकिस्तान 1965 के युद्ध मे हमारे काफी जवानअपनी जान की बाजी लगाते हुए शहीद हुए, काफी अपंग हुए,तथा काफी युद्व खत्म होने के उपरान्त सकुशल अपनी रेजिमेंट मे लौटे।
1965 के युद्व मे शहीद हुए जवानों मे एक उत्तरप्रदेश के जिला बुलंदशहर के गांव मामऊ के खुटैल परिवार में प्रहलाद सिंह का जन्म 05 जुलाई 1943 को हुआ।इनके परिवार मे इनके अलावा छ भाई व एक बहन थी।17 मई 1961को B SQN The DECCAN HORSE मे टैंक ऑपरेटर के लिए भर्ती हुए।
भारत पाकिस्तान 1965 के युद्ध मे लगभग-2 भारतीय सेना इन्फेंट्री डिवीजन काफी अदभुत साहस व पराक्रम से लड़ी मगर पाकिस्तानी वायुसेना व तोपखाने के आगे पैदल सैन्य खंड पर लगातार हमला होता रहा जिससे पाकिस्तानी सेना के हौसले बुलंद होते गए।09 सितंबर 1965 की बाद कि घटनाओं ने दोनों देशों की सेनाओं के सबसे गर्वित खंडों का दंभ चूर चूर कर दिया।भारत के 1 बख्तरबंद खंड जिसे भारतीय सेना की शान कहा जाता थासियालकोट की दिशा में हमला कर दिया।छविडा मे पाकिस्तान की अपेक्षाकृत कमजोर बख्तरबंद खंड ने बुरी तरह हरा दिया।भारतीय सेना को करीब 100 टैंक गवाने पड़े और पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा।इससे उत्साहित होकर पाकिस्तान की सेना ने भारतीयों पर प्रतिआक्रमण कर दिया और भारतीय सीमा में घुस आई।अपने अंतिम आक्रमण के लिए पाकिस्तान अपना पहला बख्तरबंद डिवीजन और 11वी इन्फेंट्री डिवीजन के साथ अमृतसर पर कब्जे के इरादे से खेमकरण पर हमला कर दिया।उनके अनुसार अमृतसर के बाद जालंधर और फिर उस समय के पाकिस्तान के राष्ट्रपति आयुबखान की तरफ से आये ब्यान के अनुसार दिल्ली अगला लक्ष्य होता।
पाकिस्तानी सेना खेमकरण से आगे बढ़ती की असल उत्तर गांव (पंजाबी) के पास भारत का चौथा माउंटेन डिवीजन, seven माउंटेन बिग्रेड,62 माउंटेन बिग्रेड, शेरमैन टैंक से सुज्जतित डेक्कन हॉर्स, अपने अन्य डिवीजन के साथ युद्व के लिए तैयार खड़ा था और इन दोनों के बीच दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ी टैंक की लड़ाई लड़ी गई।जिसमें पाकिस्तान की जबरदस्त हार हुई।पाकिस्तान ने अपने लगभग 97 टैंक खो दिए जिसमे 72 पैटर्न टैंक शामिल थे इसके अलावा 32 टैंक चलती हालत में अपने कब्जे में कर लिये।इससे पहले आगे चल रही पाकिस्तानी सेना असल उत्तर के युद्ध मे हारने के बाद भारत के पक्ष में युद्ध का संतुलन झुक गया।इस युद्ध मे प्रहलाद सिंह ने दुश्मन के टैंक के गोले से हिट होने के बावजूद बड़ी बहादुरी का परिचय दिखाया। खेमकरण सेक्टर में लड़ते हुए वह जख्मी हुए मगर इसके बावजूद उन्होंने लड़ाई जारी रखी और पाकिस्तानी सेना को भारी क्षति पहुंचाई, अदभय साहस और बहादुरी से लड़ते हुए इन्होंने घायल होते हुए भी दुश्मन को नाको चने चबाने पर मजबूर कर दिया इन्होंने बहादुरी से लड़ते हुए अपने प्राणों की परवाह न करते हुए B SQN व THE DECCAN HORSE का नाम रोशन किया तथा लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए।
देश की खातिर शहीद हुए प्रहलाद सिंह अपने पीछे अपने माता-पिता, भाई-बहन व कुछ महीने पहले हुई अपनी शादी मे धर्म पत्नी को हमेशा के लिए छोड़ कर
अमर हो गए।आज भी भारत की राजधानी दिल्ली के इंडिया गेट पर राष्ट्रीय युद्ध स्मारक बना हुआ है जिसमे की तीनों सेनाओं की छह प्रमुख लड़ाइयों का जिक्र है तथा छब्बीस हजार शहीदो के नाम भी दर्ज हैं।

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