देश में वीरों की कुर्बानी की कीमत सिर्फ “शहादत-ए-तंदूर” *

देश में वीरों की कुर्बानी की कीमत सिर्फ “शहादत-ए-तंदूर” *

देश में वीर-जवानों द्वारा दिए बलिदान को “शहादत-ए-तंदूर” बनाकर सियासत-दान चुनावी रोटियां सेकने में लगे है । हैवान वहशी-दरिंदों ने तो जिंदादिल जाबाँजो को मारा,लेकिन तुम तो शहीद-जवानों की शहादत को चील-कौवे की तरह नोच-खसोट करते हुए रबड़ की तरह, चुनावी-दायरे में घसीटते फिर रहे हो और शहीद जवानों की मय्यत की बोटी-बोटी करने पर तुले हो , अरे ! इस तरह की हरकतों से तुम तो, उन वहशी-दरिंदों के भी बाप निकले । तुम जैसे घटिया-नेताओं को ऐसी रणनीति अपनाते हुए शर्म आनी चाहिए । लगता है ! तुम्हारा जमीर बिल्कुल मर चुका है,मेरे हिसाब से नोचना-घसीटना किसी सम्मानजनक शब्द में नहीं आता है । जवानों की शहादत का इतना बड़ा अपमान देश के लिए इससे अति-दर्दनाक व शर्मनाक बात और कोई हो ही नहीं सकती हर मुद्दे को चुनाव के साथ जोड़ना इन जैसे नेताओं के लिए अब यह एक आम बात बन चुकी है । शहीदों के बलिदान की कीमत को इतना सस्ते में चुनावी-वोटो के साथ तोलना,उनकी शहादत के साथ सरासर-ज्यादती और बेईमानी है । देश-जनसंरक्षण के लिए दी जान की कीमत तुम जैसे नेताओं की जान से कई गुना अनमोल व बहुमूल्य है ।जिसका किसी भी चीज के साथ मोल-करना मुमकिन ही नहीं नामुमकिन है । इसलिए वीर-शहीद जवानो की शहादत पर घड़ियाली-आंसू बहाने वालों राजनीति-पार्टियों के नेताओं तुम में से यदि किसी के दिल में दर्द होता तो तुम सब का सुर-आगाज चुनाव-रद्द करने का होता । मां-भारती के जवानो की शहादत को मोहरा बनाते हुए “शहादत-ए-तंदूर” समझ चुनावी रोटियां-सेकंना नही होता । जाँबाजो की वीरगति का इस तरह तमाशा बनाना बंद करके, चुनावी-दायरे से कोसों दूर रखना ही बेहतर रहेगा,वर्ना इन घटिया-रणनीतियो से पूरी तरह से वाकिफ यह पब्लिक खूब जानती है,अंदर क्या है और बाहर क्या है ? यह सब कुछ पहचानती है । हर समय वोट की दुहाई देने वालो,देश के बहादूर-जवानों की शहादत की कदर तुम सही तरीके से आखिर,कब कर पाओगे ?
??जय-हिंद,जवान जय-हिंदुस्तान?? अनीता गुलेरिया

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