आलोक वर्मा अगर IPS न बनते तो इस कारोबार में उतरते, करीबी लोगों ने दी दिलचस्प जानकारियां

आलोक वर्मा अगर IPS न बनते तो इस कारोबार में उतरते, करीबी लोगों ने दी दिलचस्प जानकारियां

नई दिल्ली: देश की शीर्ष जांच एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से बाहर किए गए और फिर भारतीय पुलिस सेवा से रिटायरमेंट लेने वाले आलोक कुमार वर्मा के करीबी उन्हें बेहद मृदुभाषी बताते हैं. कहते हैं कि उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वर्मा एक दिन इतने बड़े विवाद में कूद पड़ेंगे. वर्मा जहां भी काम किए, वहां मातहत कर्मचारी उनके मुरीद जरूर रहे. वजह कि वर्मा की गंभीरता और उनके मीठे बोल स्टाफ को रास आते थे. वर्मा के करीबी उनके बारे में दिलचस्प जानकारियां बताते हैं. कहते हैं कि अब शायद अपने एक ‘पुराने शौक’ को तसल्ली से पूरा कर सकेंगे. अपनी निजी और पारिवारिक जिंदगी को बेहद पोशीदा रखने वाले वर्मा के करीबी लोगों का कहना है कि वर्मा को दिल्ली का वह हर गली कूचा पता है जहां सबसे बढ़िया कचौड़ियां, पकौड़ी, परांठें और मिठाइयां मिलती हैं.दिल्ली पुलिस में उनके साथ काम कर चुके एक अधिकारी ने कहा, ‘‘एकदम दिल्ली वालों की तरह वर्मा खाने के बेहद शौकीन हैं.” अगर पहले ही प्रयास में संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा पास न की होती तो वह भी शायद अपने भाइयों के साथ होटल कारोबार में हाथ बंटा रहे होते. प्रशासनिक गलियारों से आलोक वर्मा के परिवार का दूर दूर का भी वास्ता नहीं रहा है. उनके दोनों बड़े भाई आर के वर्मा और पी के वर्मा होटल कारोबार में हैं और उन्होंने ही दिल्ली में चाइनीज फूड की पहली चेन ‘‘दी गोल्डन ड्रेगन” स्थापित की.

आलोक कुमार वर्मा का बचपन मध्य दिल्ली के करोल बाग इलाके में पूसा रोड की सरकारी कालोनी में बीता था. उन्होंने सिविल लाइंस इलाके में सेंट जेवियर स्कूल से अपनी पढ़ाई की और उसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफेंस कालेज से इतिहास में स्नातकोत्तर डिग्री ली. वह भले ही अपने भाइयों की तरह होटल कारोबार में नहीं गए लेकिन अपने भाइयों की तरह वह खानेपीने के शौकीन हैं.आलोक कुमार वर्मा ने 22 साल की उम्र में पहले ही प्रयास में सिविल सेवा परीक्षा पास कर ली थी और वह केंद्र शासित प्रदेश कैडर के 1979 बैच के सबसे युवा अधिकारी थे. दिल्ली पुलिस में उनके करीबी रहे अधिकारियों का कहना है कि वर्मा बहुत ही मृदुभाषी इंसान हैं और कभी सपने में भी नहीं सोचा जा सकता कि वह सार्वजनिक रूप से ऐसी किसी लड़ाई में कूद पड़ेंगे. लोग बताते हैं कि दिल्ली पुलिस आयुक्त के पद पर रहते हुए वर्मा सरकारी बैठकों में भी बहुत संक्षेप में अपनी बात रखते थे और हमेशा मृदुभाषी रहते थे.‘‘

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