आज बालदिवस पर विशेष।

आज बालदिवस पर विशेष।

राकेश कुमार।                                                                                          भारत में आज़ादी के बाद से प्रत्येक वर्ष 14 नवम्बर को पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन को बालदिवस के रूप मे मनाते हैं।आज भी देश के करोड़ों बच्चे दो वक़्त की रोटी के लिए मोहताज हैं।जो समय उनका पढ़ाई लिखाई का हैं वो अभी भी बाल मजदूरी कर रहे हैं।कहते है बच्चे किसी भी देश का वर्तमान ही नहीं भविष्य भी होते है।जिस देश के बच्चे वर्तमान में जितने सम्पन होगा उस देश का भविष्य भी उतना ही उज्वल होगा।। भारत में बाल श्रम अधिनियम बननेके बाद 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से जोखिम भरे काम कराये जाते है तथा आज भी किसी ढाबे, चाय की दुकान, या बर्तन साफ करते जैसे कार्यो मे छोटू नामक बालक दिख जाएगा।। आये दिन ट्रैफिक सिग्नल पर आपको कई बच्चे भीख मांगते दिख जायेगे।यूनिसेफ ने तो इनको दो भागों मे बाट दिया हैं एक भीख मांगते हुए और दूसरा रोडो पर सामान बेचते हुए। इन्हें स्ट्रीट चिल्ड्रेन का नाम तक दे दिया है।और यहां तक कि हमारे देश की न्याय पालिका ने तो भीख माँगना ही अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है।
: मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 1करोड़ बच्चे सड़कों पर रह कर काम करते हैं।ऐसे में जिस देश के बच्चे पढ़ नही पा रहे तो उस देश के विकसित होने का सपना देखना बेफकूफ़ी ही माना जायेगा।हालांकि सर्व शिक्षा अभियान के तहत सरकार हर बच्चे को सरकारी शिक्षा देने का दावा करती है मगर सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता किसी से छुपी नहीं है।आज एक निम्न वर्ग का अभिवावक भी अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते है और दिन रात मेहनत करते है सम्पन अभिवावक भी अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं ताकि उनके बच्चे का भविष्य उज्वल बन सके।। यौन शोषण- बच्चों का यौन शोषण भी आज के समय काफी बढ़ चुका है।एक रिपोर्ट के अनुसार हर तीन घंटे मे एक बच्चे का यौन शोषण किसी न किसी रूप में किया जाता हैं।अधिकतर मामलों में अपने नजदीकी लोग हो बच्चों का यौन शोषण करने में लिप्त पाये जाते हैं।सरकार ने इसी के तहत 2012 मे पोक्सो एक्ट (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्ससुल ओफ्फेन्स)बनाया जो कि बेकार साबित होता नजर आ रहा है।। कुपोषण – देश में हर साल तीन साल से कम उम्र के दस लाख बच्चे कुपोषण के कारण मर जाते हैं।भारत में कुपोषण की श्रेणी में दक्षिणी एशिया सबसे आगे है।ग्रह मंत्रालय ने एक आर टी आई के जबाब मे बताया है कि देश में प्रत्यवर्ष नब्बे हज़ार बच्चे ग़ुम हो जाते है।एक गैर सरकारी रिपोर्ट के अनुसार एक घंटे में लगभग 11 बच्चे गुम हो जाते है। लापता बच्चे ज्यादातर शोषण का शिकार हो जाते है जो अपने घर वापस लौट नही पाते।। फिसलता बचपन- अब बचपन बचा ही कहा है।कभी समय होता था कि बच्चे स्कूल के होमवर्क के बाद घर के बाहर धमाल चौकड़ी मचाते नज़र आते थे मगर अब बच्चे इंटरनेट के मकड़जाल मे फसते नज़र आ रहे हैं व अपना जीवन का अधिकतर समय मोबाइल में सोशल मीडिया व गेम्स खेलने में गवा रहे है और अपनी आँखों को कमजोर कर रहे हैं।आखिर ये नोबत कियो आई क्योंकि अभिवावकों ने अपने बच्चों को मैदान में खेलने के लिए परेरित नही किया तथा धनोपार्जन की अंधी दौड़ में अभिवावक अपने बच्चों व परिवार से कट चुके है।ये सभी कुछ देखते हुए बचपन और बुढ़ापे में क्या फर्क रह जाएंगे।हम सब मिलकर इस बालदिवस पर इन समस्याओं का चिंतन व मंथन करते हैं।

administrator

Related Articles

1 Comment

  • राधेश्याम कटारिया , November 14, 2019 @ 2:35 pm

    बहुत सुंदर लेख है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Skip to toolbar